Rituals in Hindu Religion || क्यों नहीं करनी चाहिए एक ही गौत्र में शादी || Suresh Shrimali




|| क्यों नहीं करनी चाहिए एक ही गौत्र में शादी ||


वैज्ञानिक कारण:-

 एक दिन डिस्कवरी पर जेनेटिक बीमारियाँ से सम्बन्धित एक ज्ञानवर्धक कार्यक्रम देख रहा था। उस प्रोग्राम में एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने कहा कि जेनेटिक बीमारी न हो इसका एक ही इलाज है और वो है, “सेपरेशन आॅफ जींस” मतलब अपने नजदीकी रिश्तेदारों में विवाह नहीं करना चाहिए। क्योंकि, नजदीकी रिश्तेदारों में जींस सेपरेट (विभाजन) नहीं हो पाता और जींस लिंकेज्ड बीमारियाँ जैसे हिमोफिलिया, कलर ब्लाईंडनेस और एल्बोनिज्म होने की 100 प्रतिशत चांस होती है। फिर मुझे बहुत खुशी हुई जब उसी कार्यक्रम में ये दिखाया गया की आखिर हिन्दू धर्म में हजारों सालों पहले जींस और डी.एन.ए के बारे में कैसे लिखा गया है? हिन्दुत्व में कुल सात गोत्र होते हैं और एक गोत्र के लोग आपस में शादी नहीं कर सकते ताकि जींस सेपरेट (विभाजित) रहे उस वैज्ञानिक ने कहा कि आज पूरे विश्व को मानना पड़ेगा कि हिन्दू धर्म ही विश्व का एकमात्र ऐसा धर्म है जो विज्ञान पर आधारित है। 

गोत्र शब्द से अभिप्राय किसी एक कुल अथवा वंश से है, वास्तव में गोत्र प्रणाली का जो मुख्य उद्धेश्य है वह उसको मूल प्राचीनतम् व्यक्ति से जोड़ता है। जैसे कि एक व्यक्ति का गोत्र भारद्वाज है तो इसका तात्पर्य यह है कि उसके पूर्वज महर्षि ऋषि भारद्वाज से संबंधित है या यूँ कहे कि उस व्यक्ति का जन्म भारद्वाज पीढ़ी में हुआ है।


आपने एक ही गोत्र में शादी से जुड़ी कंट्रोवर्सीस के बारे में तो आपने सुना ही होगा। अखबारों में आए दिन कहीं ना कहीं से आॅनर किलिंग जैसी खबरे पढ़ने को मिलती रहती है कि किसी जोड़े की इसलिए हत्या कर दी गई क्योंकि उन्होंने घरवालों की इच्छा के खिलाफ, एक ही गोत्र में शादी की। खाप पंचायत ने तो एक ही गोत्र में विवाह को गैर कानूनी करार दे दिया है। 


आइए जानते है इस पूरे विवाद के बारे में पुराणों में क्या लिखा है-

भारद्वाज, कश्यप, गौतम, वशिष्ठ, विद्याश्राम, अत्रि, जमदग्नि - इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्ति की संतान ‘गोत्र‘ कहलाती है। ब्राह्मणों के विवाह में गोत्र-प्रवर का बड़ा महत्व है। पुराणों व स्मृति ग्रंथों में बताया गया है कि यदि कोई कन्या संगोत्र हो, किन्तु सप्रवर ना हो अथवा सप्रवर हो किंतु संगोत्र ना हो, तो ऐसी कन्या के विवाह को अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। 


आपस्तम्ब धर्मसूत्र कहता है समान गोत्र के पुरुष को कन्या नहीं देना चाहिए। असमान गोत्रीय के साथ विवाह ना करने पर भूल पुरुष के ब्राह्मणत्व से च्युत हो जाने तथा चांडाल पुत्र-पुत्री के उत्पन्न होने की बात कही गई। शादी में सिर्फ लड़के-लड़की का गोत्र ही नहीं बल्कि मां और दादी का भी गोत्र मिलाते हैं यानि तीन पीढ़ियों में कोई भी गोत्र समान नहीं होना चाहिए तभी शादी तय की जाती है ।


     संगोत्रीय कन्या से विवाह करता है तो उसे उस कन्या का मातृत्वत् पालन करना चाहिए। गोत्र जन्मना प्राप्त नहीं होता इसलिए विवाह के पश्चात कन्या का गोत्र बदला जाता है और उसके लिए उसके पति का गोत्र लागू हो जाता है।

     हमारी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एक ही गोत्र या एक ही कुल में विवाह करना पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है। यह प्रतिबंध इसलिए लगाया गया क्योंकि एक ही गोत्र या कुल में विवाह होने पर दंपत्ति की संतान अनुवांशिक दोष के साथ उत्पन्न होती है। ऐसे दंपत्तियों की संतान में एक सी विचारधारा, पसंद, व्यवहार आदि में कोई नयापन नहीं होता।

     ऐसे बच्चों में रचनात्मकता का अभाव होता है। विज्ञान द्वारा भी इस संबंध में यही बात कही गई है कि संगोत्र शादी करने पर अधिकांश ऐसे दंपत्ति की संतानों में अनुवांशिक दोष अर्थात् मानसिक विकलांगता, अपंगता, गंभीर रोग आदि जन्मजात ही पाए जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार इन्हीं कारणों से संगोत्र विवाह पर प्रतिबंध लगाया था।


    वैदिक हिन्दू संस्कृति में एक ही गोत्र में विवाह वर्जित होने का मुख्य कारण यह है की एक ही गोत्र से होने के कारण वह पुरुष व स्त्री भाई बहन कहलाते हैं क्योंकि उनके पूर्वज एक ही थे परन्तु यह थोड़ी अजीब बात नहीं कि जिन स्त्री व पुरुष ने एक-दूसरे को कभी देखा तक नहीं और दोनों अलग-अलग देशों में परन्तु एक ही गोत्र में जन्मे, तो वे भाई बहन हो गए इसका एक मुख्य कारण एक ही गोत्र में होने के कारण गुणसूत्रों में समानता का भी है।


     स्त्री-पुरुष जितनी अधिक दूरी पर विवाह करते हैं उनकी संतान उतनी ही अधिक प्रतिभाशाली और गुणवान होती है। उनमें आनुवंशिक रोग होने की संभावनाएं कम से कम होती हैं। उनके गुणसूत्र बहुत मजबूत होते हैं और वे जीवन-संघर्ष में सपरिस्थितियों का दृढ़ता के साथ मुकाबला करते हैं।


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